लेखक: dnsmemorialtrust
तिथि: 15 सितंबर 2024
कार्यक्रम की पृष्ठभूमि
Kashish News द्वारा प्रसारित इस वीडियो चर्चा में भारतीय रेल मंत्रालय में कार्यरत वरिष्ठ अधिकारी आदरणीय श्री निर्भय नारायण सिंह (IRTS) ने बलिया जनपद के बैरिया विधानसभा क्षेत्र के दुबे छपरा गांव में स्थानीय नागरिकों के साथ संवाद किया। यह संवाद उनके निरंतर चलने वाले जनसंपर्क अभियान “चाय पर चर्चा” का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं को सीधे लोगों के बीच बैठकर समझना और समाधान पर संवाद करना है।
क्षेत्रीय उपेक्षा और “दो भारत” की अवधारणा
चर्चा के दौरान आदरणीय श्री सिंह ने यह प्रश्न उठाया कि स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाला बलिया आज भी आधारभूत संरचना और आधुनिक सुविधाओं के मामले में पिछड़ा क्यों है।
उन्होंने एक बार फिर “दो भारत” की अवधारणा को रेखांकित किया—
एक ओर तेज़ी से विकसित होते शहरी क्षेत्र
दूसरी ओर ठहराव और उपेक्षा से जूझते ग्रामीण इलाके
विशेष रूप से बैरिया और दियारा (दोआबा) क्षेत्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विकास की यह खाई सामाजिक असंतुलन को और गहरा कर रही है।
गंगा–घाघरा नदी कटान और बाढ़ की समस्या
इस चर्चा का एक बड़ा हिस्सा नदी कटान और बाढ़ की गंभीर समस्या पर केंद्रित रहा। दुबे छपरा और आसपास के कई गांव लगातार गंगा और घाघरा नदियों के कटान की चपेट में हैं, जिससे जमीन, घर और आजीविका नष्ट हो रही है।
आदरणीय श्री सिंह ने स्पष्ट कहा कि—
अस्थायी मरम्मत और तात्कालिक राहत पर्याप्त नहीं है
स्थायी समाधान के लिए पक्के तटबंध (पक्का बांध)
आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीक से नदी किनारों का स्थिरीकरण
उन्होंने ज़ोर दिया कि यदि समय रहते मजबूत तकनीकी उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है।
युवा, शिक्षा और रोज़गार पर दृष्टिकोण
युवाओं से संवाद करते हुए उन्होंने कहा कि आज के समय में केवल डिग्री पर्याप्त नहीं है, बल्कि ज्ञान और कौशल ही असली पूंजी है।
उन्होंने विशेष रूप से निम्न बिंदुओं पर ज़ोर दिया—
कंप्यूटर और तकनीकी ज्ञान
संचार कौशल
आत्म-अनुशासन और निरंतर अध्ययन
उन्होंने फिर दोहराया कि 15 से 25 वर्ष की आयु जीवन की दिशा तय करने वाला सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। यदि इस दशक का सही उपयोग किया जाए, तो व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है।
सामुदायिक जिम्मेदारी और सामाजिक एकता
आदरणीय श्री सिंह ने बलिया के उन सभी लोगों से आह्वान किया जो उच्च पदों पर हैं या अपने-अपने क्षेत्रों में सफल हैं कि वे अपनी जड़ों की ओर लौटें।
उन्होंने कहा कि—
मार्गदर्शन (मेंटॉरिंग)
स्वास्थ्य शिविर
पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण जैसे कार्य
इन सबके माध्यम से गांवों को फिर से सशक्त बनाया जा सकता है।
साथ ही उन्होंने गांवों में कमजोर पड़ती सामूहिक भावना पर चिंता जताई और लोगों से आपसी मतभेद भुलाकर सामूहिक विकास पर ध्यान देने की अपील की।
संवाद का सार
यह “चाय पर चर्चा” केवल एक बातचीत नहीं, बल्कि नीति, प्रेरणा और जनभागीदारी का संगम थी। आदरणीय श्री निर्भय नारायण सिंह ने ग्रामीण समाज और शासन व्यवस्था के बीच एक सेतु की भूमिका निभाते हुए यह संदेश दिया कि—
सरकार संसाधन देती है, लेकिन स्थायी विकास तभी संभव है जब समाज स्वयं संगठित और जागरूक होकर आगे आए।
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